Friday, November 25, 2016

चौराहे पर


(c) Vijeta Dahiya

 तुम क्या करते हो
प्रश्न अनवरत बना रहा
शुरूआती वर्षों में तुमने कहा
कि अमुक स्कूल या कॉलेज में पढता हूँ
और फिर अगले वर्षों में बात रही
कि अमुक संस्थान में नौकरी करता हूँ
या खुद का कोई काम धंधा जमा लिया है
या किसी की पत्नी और बच्चे की माँ बनकर
मैंने घर संभाल लिया है
शायद बीच में कभी ऐसा भी हुआ है
कि तुम केवल तैयारी कर रहे थे
किसी कॉलेज में दाखिले
किसी नौकरी या शादी के लिए
नाउम्मीदी की सूरत में भी अकारण
तुम ओढ़े रहे आवरण
इस तैयारी का
और करते रहे पालन
औरों की या खुद की बनाई हुई
एक समय-सारणी का


पर क्या तुम रुके कभी किसी चौराहे पर
दोराहा एक अलग बात है
किस ओर का सवालिया निशान लिए हुए
जैसे आ जाए दोराहा नदी की मंझधार में
और किश्ती चलती रहे अनवरत
इस धार में या उस धार में
पर चौराहे पर मुमकिन होता है रुकना
कुछ ना करना
कुछ करने का नाटक भी ना करना
बस सोचना कि वाकई क्या करना है
या गलत राह पर भटक आए लोगों के लिए
दिशा बदलना या पीछे मुड़ना

चौराहे के पेड़ से गिरते हैं सेब
न्यूटन के सर पर
चौराहे पर भाषण देते हैं लेनिन
उमड़ती है जोश की लहर
चौराहे पर घूमते हैं स्टीव जॉब्स
कॉलेज बीच में छोड़कर
चौराहे से निकलते हैं सिद्धार्थ
बुद्ध होने की राह पर
चौराहे पर कबीर जैसे अनपढ़ जुलाहे
सत्संग करवाया करते हैं
चौराहे पर नफा नुक्सान छोड़कर दिमाग़
दिल की आवाज़ सुना करते हैं
चौराहे पर कविता सुनकर बहकने से
मज़लूम सर उठाया करते हैं
चौराहे पर ही क़ैस लैला के प्यार में
मजनूँ बन जाया करते हैं

चौराहे पर टूटते हैं तारे
चौराहे पर बनते हैं सितारे
चौराहे पर होती है हरेक क्रांति
कतारों में तो सिर्फ धक्के खाए जाते हैं
तुम धक्के खाते रहे हो
अपने पर्यावरण के थोपे हुए विचारों को
तुम अपनी पसंद बताते रहे हो
खुद को सडकों पर दौड़ाते रहे हो
और फिर हाँफते हुए
गले में कैमरा लटकाए हुए
तुम दो दिन चले गए पहाड़ों पर
दो घडी साँस लेने को
और वापस आकर फिर भागने लगे
रुके हुए रास्तों पर

हाँ, चौराहे पर रुकना
पहाड़ों पर रुकने जैसा सरल नहीं
चौराहे पर खड़े होने पर
तुम्हारी आज़ादी को लोग कहेंगे आवारगी
जाल बुनता जाएगा अस्थिरता का
हंसती निगाहें पूछेंगी क्या करते हो
बोध कराएँगी तुम्हें नग्नता का
चलते हुए दिमाग को अचानक रुकने पर
एहसास होगा एक रिक्तता का
क्योंकि सोचना-विचारना, ज़िन्दगी खंगालना
पर्याय है आजकल व्यर्थता का
लेकिन फिर भी
चौराहे पर कुछ वक़्त रुक जाना
क्योंकि अंतर्मन में हो या दुनिया में 
चौराहे पर ही होती है हरेक क्रांति


Friday, July 22, 2016

बस्तियों के राजकुमार? (The princes of slums)

काँच के शहरों में ऐसा होता है 
धूल में खेलते हुए गाँव में भी हुआ है  
हो सकता है ऐसा बाँसुरी बजाते हुए पहाड़ों में, 
और चाँदनी में नहाते हुए रेगिस्तान में भी 
जंगली वन में भले ही मुश्किल हो ऐसा होना
पर नामुमकिन बिल्कुल नहीं 
   
लेकिन बस्तियाँ जो खुद विशेषण हैं 
एक अलग तरह की उमस 
उस बस्तियों के जैसे अँधेरे का 
अनमनी शाम और सवेरे का 
उन बस्तियों में ना कभी यह हुआ 
और होने के आसार भी नहीं 

कैसे कहूँ 
कहूँ ऐसे कि बस्तियों में राजकुमार पैदा नहीं होते 
तो यह भगवान पर पक्षपात का आरोप होगा
और कहूँ कि बस्तियों में पैदा होने वाले 
कभी राजकुमार नहीं बन सकते 
तो हमारे संवैधानिक अवसर की समानता पर
एक सवालिया निशान होगा  

अगर सवाल के जवाब के लिए तहक़ीक़ात हुई  
तो सरकारी स्कूल का प्रिंसिपल और कोई मास्टर 
काजू बर्फी के शौक़ीन स्कूल इंस्पैक्टर और डायरेक्टर
मंत्री, एम एल ए, काउंसलर,   
कोई एन.जी.ओ. वाला, कोई ड्रग डीलर 
मुफ्त के छोले कुल्चे खाने वाला पुलिसिया 
तो कोई प्रॉपर्टी डीलर और बिल्डर  
मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, कारखाने वाला बाबू 
जिसे सस्ते मजदूर चाहिए   
और ना जाने कौन कौन पूछताछ के लिए बुलाए जाएँगे 
और दुविधा यह है कि फिर पूछताछ करेगा कौन

झमेला छोड़िए और बस यूँ कहिए 
इन बस्ती वालों ने तो बस 
बस्ती का माहौल ख़राब कर रखा है 
ये लोग ही जाने कैसे हैं जो 
राजकुमारों को पसंद नहीं करते 

Wednesday, May 18, 2016

Mard ka dard (मर्द का दर्द)

वह इंसानों के घर में ही पैदा हुआ था
जन्म के समय उसे कोई बीमारी नहीं थी
हाथ-पैर, नाक, कान, आँख, मुँह सब सही थे
हाँ, दिल और दिमाग भी
उसे बड़े हो कर एक आदमी बन जाना था
लेकिन समाज ने उसे कहीं का ना छोड़ा
और अंत में वह
एक मर्द बनकर रह गया

बचपन में
उसके गाल बहुत मुलायम थे
जो स्कूल से आते हुए
जेठ की दुपहरी में लाल हो जाते थे
माँ ठंडे पानी से उसका मुँह धो कर 
अपने आँचल से पोंछती बड़े प्यार से 
शाम को मोहल्ले के सभी बच्चे
जिनके लड़का-लड़की में श्रेणित होने में
अभी एक-दो साल बाकी थे
सब इकट्ठे हो कर पैंडलूस खेलते,
कभी धूल में लेटते 
कभी किसी को पीटते और कभी खुद पिट जाते
वह बारिश में नंग-धडंग नहाता था
वह नाली के पानी में कागज़ की किश्ती चलाता था
और सुनने में तो यह भी आया है कि
पिताजी जब तक उसके लिए बन्दूक नहीं लाए थे
वह एक-दो बार गुड़ियों से भी खेला था 
वह अपने नन्हे हाथों से घर में झाड़ू लगाता
कभी चूल्हे के पास बैठकर माँ के साथ
अपनी छोटी सी रोटी बनाता  
माँ का लाडला, जो जल्दी ही
किसी भी बात पर रूठ जाता था

फिर एक दिन
अपनी नाक के नीचे हो रहे इस तमाशे की
उसके पिताजी को भनक लग गई
उन्होंने उसे इतना ज़ोर से डाँटा
कि उसके दिल की एक आर्टरी बंद हो गई
रक्त का संचार कुछ तेज़ गति से होने लगा 
एहसास का दिल में जाना रुक गया

फिर उसे रामायण का पाठ पढ़ाया गया
एक पर-स्त्री के स्पर्श मात्र से होने वाले
अनर्थ के बारे में बताया गया
फिर वह लड़कों से तो
अजनबी होने पर भी गले मिल लेता
पर किसी जान-पहचान की लड़की से भी
कभी हाथ ना मिला पाया 
उसे सब लड़कियों से बात करने में
शर्म महसूस होने लगी

उसने माँ को सब बातें बताना छोड़ दिया
अपनी बहन के साथ भी उसका
सब हंसी-मज़ाक सहम गया
लड़ाईयाँ शांत हो गई
वह बहन का रक्षक बन गया

वह छूआ-छूत का खेल सरकारी स्कूल में भी था
जहाँ क्लास में लड़कियों को
अलग लाइन में बिठाया जाता था
और बाहर मैदान में एक पी.टी.आई.
इस तरह नज़र रखता था
जैसे एक गड़रिया
अपनी भेड़ों को भेड़िये से बचाता है
लेकिन तब तक भी उसकी
थोड़ी सी मासूमियत का क़त्ल होना बाकी था

फिर कुछ ऐसा था
जिसका नाम उसने इधर-उधर सुना था
जिसका मतलब उसे ना बता कर
जिसके बारे में हर जानकारी उस से छुपा कर
उसके मन में जरुरत से ज़्यादा
उत्साह उत्पन्न कर दिया गया था
जिसका ज़िक्र सब लड़कों में हंसी के साथ
कानाफूसी और इशारों में होता था
जो कभी एक एडवेंचर तो कभी
उसका एक अपराध बोध बन गया था 
और इस तरह धीरे धीरे
वह मर्द बन रहा था
उसकी गुणवत्ता का पैमाना
ईमानदारी, सच्चाई या खुशमिजाज़ी ना हो कर
अब उसकी मर्दानगी था
और मर्दानगी का पैमाना बहुत गड़बड़ था

वह बात बात पर
माँ-बहन की गालियाँ देने लगा 
हवा के झोंकों के साथ बात करने की बजाए
किसी जंगली सूअर की तरह आँखें निकाल कर 
अपनी और दूसरों की जान दाँव पर लगा कर
बहुत तेज़ स्पीड पर कार चलाने लगा  
शराब पीते हुए उसे हर वक़्त बस
और ज़्यादा पीने की ललक लगी रही
उसने एक घूँट में पैग पिए
उसने बिना पानी के पी, उसने उल्टियाँ की
वह नशे में बदहवास हुआ, फिर गिर कर सो गया 
उसने कम वक़्त में ज़्यादा पीने के बहुत रिकॉर्ड बनाए
बस शराब के खुमार का कभी
इत्मीनान से आनंद नहीं लिया
वह कभी ना जान पाया वह मासूम एहसास
किसी अजनबी से नज़र मिल जाना
और एक मुस्कराहट का इधर से उधर तैर जाना
क्यूंकि लड़कों की तरफ मुस्कुराने में
उसे समलैंगिक समझे जाने का डर लगा रहा
और लड़कियों से नज़र मिलाने की बजाए
वह उन्हें कनखियों से घूरता रहा
वह एक नायक बन सकता था
किसी लड़की को तंग किये जाने पर एतराज़ जताकर
लेकिन वह मर्द एक कायर बना रहा 
वह किसी मजदूरी की भट्टी में जलते हुए बच्चे का
फरिश्ता बन सकता था
लेकिन उस भट्टी की आग से उसका पत्थर दिल नहीं पिघला
वह किसी लड़की के दिल का
अरमान हो सकता था
लेकिन वह आशिक़ और लफंगा होने में
कभी फ़र्क़ नहीं समझ पाया
वह देशभक्ति का जज़्बा लिए हुए
एक राष्ट्रनिर्माता हो सकता था लेकिन
उसे दिखाई दिए केवल
भगत सिंह की मूँछ का ताव और उसकी बन्दूक
वह कभी नहीं देख पाया उसके ज्वलंत विचार
उसकी नि:स्वार्थ भावना और इंसानियत को   
वह बन सकता था एक चित्रकार या डांसर 
लेकिन वह डोले बनाना ही अपना हठधर्म समझता रहा 
वह अपनी बहन की विदाई पर रो नहीं पाया  
वह एक आखिरी बार भी उसे गले ना लगा सका 
बस खड़ा रहा दूर किसी कोने में
जज़्बातों के तूफ़ान को होंठों तले दबोचे हुए

उसने कभी मोहब्बत की तपिश महसूस नहीं की 
पर हाँ, उसकी एक गर्लफ्रेंड बन गई
पहली बार किसी हमसफ़र का हाथ पकड़ने पर
उसके दिल में गुदगुदी नहीं हुई  
उसे उसकी बाँहों में जहान नहीं मिला
शर्म से सुर्ख हुए गालों में
कभी सुबह का आसमान नहीं मिला
क्योंकि वह हर वक़्त
सिर्फ और सिर्फ सैक्स के लिए मचलता रहा
और उसे उसमें भी जन्नत नसीब नहीं हुई
उसके ओछेपन को बस एक बात मिल गई
दोस्तों के आगे डींगें हाँकने के लिए
फिर वह धोखा करता हुआ लड़कियों के दिल तोड़ता रहा
और गिनती करता रहा अपने सैक्स एपिसोड्स की
लेकिन उसका मन यूँ ही शुष्क रहा
उसने मोहब्बत में लुट जाने का मज़ा ना जाना
उसने किसी को खाते हुए, मुस्कुराते हुए,
गाते हुए, उसके पास आते हुए,
सोते हुए, कुछ कुछ बताते हुए देखने 
और देखते रहने का सुकून कभी ना पाया

उसकी शादी की सुहाग रात पर
उसकी पत्नी रातरानी के फूल जैसी
सकुचाई हुई बैठी थी
एक मादकता का फुव्वारा अपने नाखूनों में छिपाए हुए
आसमान में देवता अपने हाथों की अंजुलि में
फूल लिए खड़े थे
नैसर्गिक सौंदर्य से भरी हुई एक रासलीला
उसके बिस्तर के सिराहने खड़ी थी
चादर की गुलझटों में लुका-छिपी करने के लिए
लेकिन मर्दानगी वहाँ भी आ धमकी
रोमांस के पर्दों में आग लगाने के लिए
उसका मन खुद को साबित करने में ही जकड़ा रहा
उसका तन लकड़ी की तरह अकड़ा रहा 
उसने खुद को फिर एक बार मर्द साबित कर लिया 
और बस इतनी ही देर में रात बुझ गई
कमरे की बत्ती जल गई
और एक प्यासी नदी धूल में मिल गई
जो अधिकतर प्यासी ही रही

फिर जब उसे एक बच्चा हुआ
तो दुनिया को भी अपनी मर्दानगी का सबूत दे कर
वह बहुत खुश हुआ
फिर चारों तरफ देखा तो दिखा
कि कुछ कमनसीब लोगों के सिवा
सभी के पास अपने अपने बच्चे थे
फिर कौनसी इस में बड़ी बात थी
जिसे साबित करने के लिए वह ज़िन्दगी भर
एक आदमी बनने से कतराता रहा

तब भी उसकी बेटी उसके निर्जन को हरा कर देती
उसके गालों को चूम कर
उसकी गोदी में झूम कर
उसका बेटा अपनी मीठी मीठी बातों से
अपने स्कूल के हँसी-मज़ाक के किस्से सुनाकर
उसका उपचार कर सकता था
लेकिन वह उनका भविष्य बनाने वाला
डाँट-डपट कर उन्हें बिगड़ने से बचाने वाला
कभी प्यार ना दिखाने वाला
एक अक्खड़ बाप बना रहा
नौकरी में उसका बॉस
और चौराहे पर खड़ा पुलिसिया 
जब तब उसकी मर्दानगी पर चोट करता रहा
जिसका गुस्सा वह बच्चों की पढाई पर
या कभी पत्नी के खाने पर निकालता रहा
फिर पत्नी के साथ धीरे धीरे
उसका सम्बन्ध बस नाम का रह गया

उसकी मर्दानगी के शिथिल होने पर
डींगे हाँकने वाली जवानी खोने पर
उसके पास करने को कुछ भी ना रहा
वह नए ज़माने को गाली देता हुआ
मौत का इंतज़ार करता है

Sunday, May 15, 2016

धुंध

बूझो तो जानें
या सिर्फ मिथ्या मानें
उस चीज़ को
जो है फूल की गंध जैसी
पानी में उठती तरंग जैसी
क्या है वह
जो किसी पुराने दोस्त की तरह
पीछे से दबे पाँव आती है
और ढक लेती है तुम्हारी आँखें
अपनी हथेलियों से
जिसे तुम छू नहीं पाते
और वह तुम्हें छू कर चली जाती है
एकाएक
कभी दफ्तर में अकेले होने पर
किसे ढूँढती हैं तुम्हारी आँखें खिड़की के बाहर
क्यों स्तब्ध हो जाते हो तुम
किसी झील के किनारे खड़े हुए
हवा के एक झोंके से
तुम्हारी आँख में पानी भर आता है
दिल में एक हूक सी उठती है
तुम मुस्कुराने लगते हो
गलती से

क्या होता है तुम्हारे साथ ऐसा
या ऐसा होना बंद हो गया है

कि औरों के साथ तुम्हारा मुँह
बोलने से बंद नहीं होता
और अकेले कहीं भी जाने या कुछ भी करने में
तुम्हें डर लगता है
और अकेले कहीं जाना भी पड़ जाए
बस में, मेट्रो में  
तो अपने दिमाग़ को खूब उलझाए रखते हो तुम
मोबाइल के किसी गेम में या अखबार में
चुगलियों में, रोज़ की उलझनों में
फायदे-नुक्सान में
आगे के किसी प्लान में  

फिर भी कभी कभी चोरी-छिपे
भीड़ के बीच में से
वह आ पहुँचे तुम तक पीछे से
और ढक ले तुम्हारी आँखें
अपनी हथेलियों से
तो खुद को झटकते हो तुम
कहते हो कि कुछ भी तो नहीं
कि तुम्हें याद तो है ही नहीं कि क्या है
तुम साथ ही भूल भी गए हो कहीं
कि कुछ था
जो दिखता नहीं था,
जिसे छू नहीं सकते थे,
एक आवाज़ जो सुनाई नहीं देती थी
पर तुम्हें कहीं बुलाती थी
जाओगे वहाँ
ढूँढ पाओगे उसे
या हर बात को अब कहोगे
मिथ्या और बकवास 

Friday, March 25, 2016

स्टारडस्ट (Stardust) - a poem for Rohith Vemula



रोहिथ, तुम्हें
बचपन में कभी प्यार नहीं मिला
तुम्हारा जन्म एक भयंकर दुर्घटना थी
तुम गर्भ से लिखवा कर आए थे
नीची नज़रों से देखा जाना
तुम्हें विरासत में मिला हुआ था
दुनिया की दुत्कार खाना
तुमने जब कभी खुद को
एक इंसान के रूप में देखने की कोशिश की
तुम्हें आईना दिखाया गया
तुम्हारी पहचान से अवगत कराया गया
कि तुम सबसे पहले एक दलित हो
और उसके बाद
तुम्हें कुछ होने नहीं दिया जाएगा
तुम दलितों पर होने वाले शोषण सहोगे
दलितों के हक की बात कहोगे
अम्बेडकर  तुम्हारे लिए आदर्श होंगे
तुम दलितों के लिए निर्धारित काम करोगे
अगर इतना पढ़-लिख सके
कि किसी नौकरी का सोच सको
तो नौकरी में आरक्षण पाओगे
खैर, जो भी नौकरी पाओ
अगर नेता भी बन जाओ
तो भी दलित नेता ही कहलाओगे
उसी दृष्टि से देखे जाओगे

लेकिन तुम्हारा हरेक बात पर चकित होना 
जीवन को बहते देखना अविरल
मन में निरंतर उठते सवाल 
प्रकृति पर नित नया कौतूहल
जिसे अक्सर स्कूल में मार दिया जाता है
किसी तरह बच निकला
तुमने हीन भावना के नागपाश को तोड़ दिया
शोषक दुनिया के लिए नफरत
तुम्हें नहीं जकड़ पायी
जाने कैसे हुआ यह चमत्कार
जो उस दुर्घटना से टकरा गया
कि तुम नीचे तबके के
तुम नीची जाति के 
इतने ऊँचे आसमान को देखने लगे
जाने कहाँ से तुमने कार्ल सागन का नाम सुना
कैसे तुम उसके रस्ते पर चलने लगे
मैं नहीं जानता कि कार्ल सागन कौन था
पर जिसकी तरह तुम बनना चाहते थे
वह तुम्हारे जैसा ही कोई होगा
आसमान में झाँकने वाला
चाँद को निहारने वाला
तारे गिनने वाला
विज्ञान पर लिखने वाला
कोई दीवाना खगोलशास्त्री

तुम उसकी तरह लिखना चाहते थे
पर इस बार दुर्घटना चमत्कार से टकरा गई
और अंत में तुम
बस एक सुसाईड नोट लिख पाए
तुम्हारा एक दुर्लभ उत्सुक, सुन्दर मन था
जिस में एक निराला स्वप्न था
तुम स्टारडस्ट से बने थे
तुम्हारे दिमाग में बहुत से अनोखे ख्याल थे
मानवता और विज्ञान के
पर मुझे अफ़सोस है
कि तुम्हारी क्षमता से दुनिया वंचित रह गई
अब कुछ लोग तुम्हारे लिए न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं 
वे हार मानने को तैयार नहीं
मुझे उनकी लड़ाई से बहुत हमदर्दी है
कुछ दूसरे लोग तुम्हें कायर और पलायनवादी कहते हैं
कहते हैं कि तुम हार गए
मुझे उनसे और भी ज़्यादा हमदर्दी होती है
वे जीवन की प्रत्येक कोमलता से वंचित हो चुके हैं
तुम हार-जीत से परे जहाँ चले गए हो
वहाँ उनकी कठोरता नहीं पहुँच सकती
लेकिन उन्हें अपनी इस कठोरता के साथ
अपना पूरा जीवन गुज़ारना है
यूनिवर्सिटी, पुलिस, कचहरी, राजनीति  
अब तुम किसी के लिए जवाबदेह नहीं हो
तुम अनंत में शामिल हो गए हो
हैदराबाद के एक घर की छत पर खड़ा हुआ
एक बच्चा एक तारे को ढूँढ रहा है 
ओरियन का एक तारा जो ओझल हो गया है
क्योंकि हैदराबाद के आकाश में आज बहुत धुआँ है
कुछ देर वहाँ चमकना रोहिथ
उस तारे के मिल जाने पर फिर निकल जाना
नई उल्काओं, ग्रहों, सितारों
और नए संसारों की खोज में..... 



Saturday, February 6, 2016

कम्युनिस्ट बचपन (communist bachpan)

बचपन में ही संयोगवश
मैं कम्युनिस्ट बन गया था
अलबत्ता कम्युनिज्म शब्द का अर्थ
उस वक़्त मुझे नहीं पता था

सात साल का था मैं उस वक़्त
जब उस दिन सड़क पर
मेरी कुल्फी को निहारती हुई
एक ललचाही निगाह को देख कर
मैंने आधी कुल्फी खाई
और बाकी उस गरीब लड़के को दे दी थी
उस दिन मैं कम्युनिस्ट बन गया था
अनायास ही मुँह से निकला था
कि कितना अच्छा हो
अगर दुनिया में कोई गरीब न हो
सब लोग आपस में
अपना सब कुछ बाँट लें

हो सकता है कि मुझ पर
पड़ा हो कहानियों का असर
उस वक़्त कहानियाँ भी कम्युनिस्ट थी
एक स्वार्थी दानव ने बच्चों को
अपने बगीचे में खेलने से रोक दिया
तो उसका बगीचा मुरझा गया
जब उसने एक बच्चे को गोदी में लिया
और खेलने दिया सभी को
फिर से अपने बगीचे में
ऐसे ही मुफ्त में
बिना किसी टिकट के
तो वहाँ बहार आ गई
फूल खिल गए, पेड़ लहराए
चिड़िया चहचहाई
वह चिड़िया भी कम्युनिस्ट थी

येसु ने पत्थरों को रोटियाँ बनाकर
बाँट दिया गरीबों में
कर्ण ने दे दिए दान में अपने कुण्डल
कृष्ण ने एक औरत की दयालुता से खुश हो कर
उसके चनों को मोतियों में बदल दिया
कहानी के अंत में नैतिक शिक्षा होती थी
की गरीबों को किया गया दान
सीधा भगवान को जाता है
जो निः स्वार्थ भाव से दूसरों के लिए कुछ करें
वह ऊपर वाले का आशीर्वाद पाता है
देखिये, उस वक़्त तो भगवान भी कम्युनिस्ट था
तो फिर मेरा क्या कसूर

ख़ुशी भी कम्युनिस्ट थी
वह बाँटने से बढ़ती थी
प्रेम लुटाने से मिलता था

शादी किसी एक घर में हो
पर पूरा गाँव शादी के खर्च के लिए
कन्यादान देता था
बारात कम्युनिस्ट चौपाल में ठहरती थी
कप प्लेट चम्मच, खाट, बिस्तर, कुर्सियाँ
पड़ोसियों के घर से मिल जाते थे
बिना किसी किराए के

लुका छिपी खेलते हुए
हम किसी के भी गितवाड़े में
छुप जाते थे
एक ही क्रिकेट बैट से सब
तड़ातड़ शॉट लगाते थे
सभी की एक ही फुटबॉल थी
सबका वही खेल का मैदान था
किसी के भी खेत में
चल रहे ट्यूबवैल में नहा लेते थे हम
बिना किसी की permission के

सभी के कपड़ों का मैल
उसी एक कम्युनिस्ट नहर के पानी से धुलता था
कम्युनिस्ट पेड़ों की लकड़ी का ईंधन
सब चूल्हों में बराबर आग से जलता था
एक कम्युनिस्ट कुआँ सबकी प्यास बुझाता था
हर कोई अपनी भैंस को
उसी कम्युनिस्ट तालाब में नहलाता था
कम्युनिस्ट अखाड़े में हर कोई करता था
कुश्ती और कसरत बिना किसी मासिक चार्ज के
वही एक कुत्ता रात को मोहल्ले के
सब घरों की चौकीदारी करता था

एक ही घर में टीवी था
जहाँ पूरा मोहल्ला रविवार को
रामायण देखता था
उस कम्युनिस्ट टेलीविज़न पर
पूर्णमासी के दिन
किसी के घर पर हलवा खाया
किसी के घर पर खीर

बन्दर को नचाने वाला
साइकिल पर करतब दिखाने वाला
सांग में रागनी गाने वाला
वे सब भी कम्युनिस्ट थे
जितना जो कुछ मेरे पास हुआ
मैंने अपनी मर्ज़ी से दे दिया
पर कभी किसी ने टिकट नहीं मांगी मुझसे
सब कुछ सभी के लिए था

शायद गाँव में सब लोग कम्युनिस्ट ना हों
क्यूंकि गाँव में कहीं एक बाज़ार भी था
जहाँ मैं कभी गया नहीं
और सुनते हैं कि कोई ज़मींदार भी था
जिस से मैं कभी मिला नहीं
मुझे पूरे गाँव में
खेतों में, नहरों में,
घरों और मंदिरों में
गुरूद्वारे के लंगरों में
तीज के झूलों में
दशहरे के पुतलों में
होली के दहन में
दीवाली की फूलझड़ियों में
जनाज़ों में, शादियों में
गाँव की हर बात में हर जगह
कम्युनिज्म का इंद्रधनुष दिखता था

फिल्में भी कम्युनिस्ट थी
अमीरों के घरों से रुपया चुरा कर
जो गरीबों में बाँटता था
उसे हीरो कहा जाता था

तब तो चाँद-सूरज भी कम्युनिस्ट थे
चाँद की शीतल चाँदनी
सूरज की गर्मागर्म रोशनी
सभी को बराबर की मिलती थी


part 2

फिर मैं बड़ा होने लगा
तो परियाँ उड़ कर अपने देश चली गईं
कम्युनिज्म को भी ले गईं
आसपास के लोग आपस में लड़ने लगे
एक कंटीली बाड़ हर तरफ
अपना घेराव फैलाने लगी

तब मुझे अपना पराया समझाया गया
अपना सब कुछ संभाल कर रखना
किसी से कुछ खरीद लो तो ठीक है
वैसे किसी से कुछ भी ना लेना
बचपन में मैं सभी के लिए कृतज्ञ था
उनकी तरह मैं भी उनके लिए कुछ भी कर सकता था
अब मुझे फायदा-नुक्सान, एहसान-फरामोशी
और साथ में thank you कहना सिखलाया गया

अब मुझे प्रॉपर्टी का मतलब समझाया गया
कारोबारों, मालिकों और मजदूरों
नौकरी, तनख्वाह और मैनेजरों
लोकतंत्र, इलेक्शन और वोटरों
संविधान और सरकारों
फ़ौज और हथियारों
पुलिस और कचहरियों
खेतों और लगानों
इन सब के बारे में बताया गया

कम्युनिस्ट कुओं का पानी गंदला हो गया
घरों में सरकारी नलों का पानी आया
उस पानी को पीने से
सरकारी हस्पताल में इलाज कराने से
फिर मैं धीरे धीरे समाजवादी बन गया

part 3

अब मैं युवावस्था से निकल कर
आदमी बनने की उम्र में आ गया हूँ

अब पता चला है कि
कैसे हर एक आदमी कमीना होता है
डंडे के  बिना कोई काम नहीं करता
हर सरकारी मुलजिम आलसी और भ्रष्ट होता है
इसलिए प्राइवेट कंपनी और उद्योगपति
हर काम की कमान सँभालने लगे हैं
ताकि अब कोई आराम ना हो
दिन रात खून-पसीना बहा कर
बहुत सारा काम हो

कोई आदमी ठण्ड में ठिठुरता मरे
कोई किसान आत्महत्या करे
कोई औरत फुटपाथ पर
बच्चे को जन्म देने पर विवश हो
या किसी सरकारी विद्यालय में
बच्चों के सपने और भविष्य नष्ट हो
हमें  बस चाहिए कि
हम इधर उधर का कुछ ना सोचें
सिवाए इसके कि
growth हो और देश आगे बढे

कम्युनिज्म अब केवल जंगल में बचा है
जहाँ अब भी सभी पंछी
हरेक डाल पर गाते हैं
सभी शेर पूरे जंगल में शिकार करते हैं
सभी हिरण वही घास खाते हैं
इसलिए सिवाए एक दो झूठ के कम्युनिस्ट के
जो संसद में बैठते हैं
बाकी सभी कम्युनिस्ट जंगलों में चले गए
लेकिन अब सरकार उन्हें वहाँ भी
छुपने नहीं देगी
जल्द ही सभी का सफाया कर देगी
उन लोगों की औक़ात ही क्या है
जब बाकी सब कुछ बदला जा चुका है
हर तरफ से कम्युनिज्म का साया
उठाया जा चुका है

दिल्ली में कम्युनिज्म की बात की
तो आपको अंडा सैल में क़ैद कर दिया जाएगा
कोई आपकी खबर भी ना दिखाएगा
क्यूंकि कम्युनिज्म का मतलब
लोगों के दिमागी शब्दकोष में बदल कर
अब आतंकवाद कर दिया गया है
कम्युनिस्ट लेखकों को अब
देशद्रोही क़रार कर दिया गया है

अब भगवान भी कम्युनिस्ट नहीं रहा
वह भी मुल्लाओं की टोपियों
और हिन्दुओं के तिलक में बैठ कर
एक दंगे फसाद करने वाला
पत्थर फेंकने वाला
वोट बैंक बनाने वाला
घरों में आग लगाने वाला
बच्चों को ज़िंदा जलाने वाला
औरतों का बलात्कार करने वाला
एक मुस्टंडा बन गया है
अब वह कम्युनिस्ट नहीं रहा

ख़ुशी भी अब कम्युनिस्ट नहीं रही
वह अब बाँटने से नहीं बढ़ती
सामान इकट्ठा करने से मिलती है
वह अब मॉल में बिकती है
अब किसी काम में ख़ुशी नहीं है
वह सब कुछ दिखाने से मिलती है
वह अब दिल में नहीं बसती
वह अब फेसबुक पर दिखती है
बड़े फ्लैट में रहती है
और कार में घूमती है

अब बच्चे भी कम्युनिस्ट नहीं रहे
अब सभी का अपना अपना क्रिकेट बैट है
सभी की अपनी अपनी स्पोर्ट्स कोचिंग
सभी का मासिक चार्ज वाला gym है
अब अच्छे बच्चे
बस्ती के गंदे बच्चों से दूर रहते हैं
डर रहता है कि बस्तियों के बच्चे
उन्हें कहीं गालियाँ देना ना सिखा दें
और उस से भी बड़ा डर यह कि कहीं
हमारे बच्चों को वे अपनी गरीबी ना दिखा दें
कहीं हमारे future champions में वे
इंसानियत ना जगा दें

अब सूरज अमीरों के बंगले की बालकनी से
एक अच्छा view देता है
गरीबों की झोंपड़ियों पर मँडराती हैं
ऊंची इमारतों की काली छाया
वहाँ अब अँधेरा रहने लगा है
वहाँ चमकने के लिए
सूरज के पास वक़्त नहीं होता
वहाँ सूरज केवल कड़कता है
गर्मियों की सिखर दोपहरी में
मज़ा आता है उसे मजदूरों के
बदन को जलाने में

समुद्र भी अमीरों को
अपनी अटखेलियों से रिझाता है
साफ़ सुथरे beach पर अपनी लहरों से
उनके पैरों को सहलाता है
गरीबों को देख कर गुर्राता है
जब कभी आता है उनकी तरफ
तो एक तूफ़ान के साथ
उनका सब कुछ लूट ले जाता है

अब मैं gym में कसरत करने
बैंक्वेट हॉल में शादी करने
रेस्तरां में खाना खाने
बार में बीयर पीने
सिनेमा हॉल में फिल्म देखने
डिस्को में नाचने
खेलने, घूमने, मस्ती करने
हर चीज़ के लिए मॉल में जाता हूँ
अब मोहल्ले में कुछ नहीं होता
वहाँ मॉल का चौकीदार
अपने जैसे किसी गरीब पर भौंकता है
फिर मेरे महंगे कपड़ों को
एक ज़ोर का सलाम ठोंकता है
मुझे बहुत अच्छा लगता है

अब मैं समाजवादी नहीं रहा
और शायद एक कैपिटलिस्ट भी नहीं हूँ
मैं क्या हूँ, मैं नहीं जानता
या शायद मैं कुछ भी नहीं हूँ
और मैं सोचता भी नहीं
क्यूंकि सोचना भी अब
बिना किसी फायदे की
एक बेकार की बीमारी है