Friday, April 13, 2018

The box of water colors

                                                             painting (c) tahseen khan
















The child looked out the window
He saw the rainbow in the sky
It was a continuum
With so many shades of color

He wished to paint it
But the child wasn't allowed water colours
Rather only twelve sketch pens
The teacher cut through the rainbow
And laid it out in seven stripes
V.I.B.G.Y.O.R.
With each band of color
Separted from the other
With the thick black outline of a pencil
Each of which
Was filled neatly by the child
With the seven colours
The teacher examined the drawing
And judged that the colors were correct 
Now, the rainbow was plastic
Made of seven coloured bands

The feminists took apart the violet band
To make a poster
The orange was taken by Hindus
To be waved as their flag 
Muslims painted their star and crescent
On the green one
Whereas the spirituals stole the indigo
The dalits wore the blue on their sleeve
While the red band was tied
To their forehead by the communists
The child was left with just the yellow
which he baked into a cake

Again he looked out the window
Felt wistful about the rainbow
However there was
A beautiful continuum of colour
Everywhere outside that classroom
But the teacher wouldn't let him
Touch the water colors 
The drawing of his observation
Topped with rich imagination
Was fragmented again into neat portions
Each of which was to be filled
With one of the twelve sketch pens
Painting became less of an art
And more of a mechanical task
Which the teacher termed colouring
In which the only precision was
To keep neat outlines

Nature lost its nuance that day 
The world became since then
A calculable cluster of categories
Although the child
Has changed into a man
He still works with sketch pens
While the box of water colors
Remains hidden somewhere
Buried in a deep corner

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Saturday, December 16, 2017

प्यार का गणित (Pyaar ka ganit)




















तंग हालात थे
घर में दाल बनी थी
मुझे दो रोटी की भूख थी
और दो रोटी की तुम्हें भी
रोटियाँ केवल तीन थी
हम इकठ्ठे खाने बैठे
और हम दोनों का पेट भर गया

फिर दिन फिरे
घर में शाही पनीर बना
उस दिन भी हम दोनों को
दो दो रोटी की भूख थी
हम इकट्ठे खाने बैठे
हम ने पाँच रोटियाँ खाई
और मन फिर भी भरा नहीं

बात दाल या शाही पनीर की नहीं
यह प्यार का गणित है
जहाँ दो जमा दो जरूरत में तीन 
और लुत्फ़ में पाँच हो जाता है

(dedicated to my wife on our anniversary)

Tuesday, December 12, 2017

खिड़कियाँ (Khidkiyaan)



 
फ़र्ज़ करो कि
तुम्हारा दिलो-दिमाग़ एक घर है
हटा दिए जिसमें से
खिड़की दरवाज़ें रौशनदान सभी
अब यहाँ उल्लू उड़ते हैं
चमगादड़ मँडराते हैं 
मकड़ियों ने बुने हैं जाले 
मच्छरों ने अंडे दिए हैं
कोनों में लगी है फफूंद 
पनपने लगी हैं बीमारियाँ
उमस की बदबू फैली है
कीचड़ की छींटे उठती हैं
जब भटकते हो
पटकते हुए माथा दीवारों पर
काँपते हाथ बने हैं हथियार 
सन्नाटे को तोड़ती हैं सिर्फ गालियाँ
कुछ नहीं सूझता 
कुछ नहीं देता दिखाई
हो गई है बिनाई
अँधेरे की गिरफ़्त में  
शम्अ जलाओ तो धुँआ भर जाएगा
यह दिलो-दिमाग़ एक मक़बरा है
जिसमें तुमने खुद को 
ज़िंदा चिनवा दिया है

जल्दी करो 
मारो हथौड़ा दीवार पर 
और एक रौशनदान बनाओ  
जहाँ से आती हुई धूप
गरमाइश दे सके जमे हुए फ़र्श को
रौशनी फ़र्क़ कर सके
शरबत और ज़हर में
काले और सफ़ेद में आँखों को 
ग़लतफहमी ना हो
एक खिड़की लगाओ जिसकी सिल पर
कोई चिड़िया बैठकर गीत गाए
जिसके छज्जे पर टपकती हुई
बारिश की बूँदें कोई संगीत सुनाए
एक दरवाज़ा लगाओ जहाँ से
तुम घूमने के लिए बाहर निकलो
कभी कोई कवि अंदर सके
इस आने जाने में
पुराना कबाड़ निकाला जाए बाहर  
नया सामान सजाया जा सके
गमलों में उग सकें नए पौधे
बसंती हवा कोने कोने को महका जाए
यह दिलो-दिमाग एक महल है
जिसमें तुमने खुद को
सिंहासन पर बिठाया है

अंधी दीवारों वाले मक़बरे में रहोगे
या रहोगे हवादार रौशन महल में
यह फैसला तुम्हारा है

Thursday, June 15, 2017

बदहवासी (badhawasi) - ek ghazal




















तर्क से समझकर कोई किसी की नहीं मानता
सबने माना तो जरूर बेवकूफ़ बनाए जा रहे हैं

बनाएँगे घर चाँद पर, वहाँ मिल गया है पानी, 
यहाँ पड़ोस के घर में आग लगाए जा रहे हैं   

बिना मतलब के कुछ नहीं मतलबी दुनिया में
हाँ, ज़िन्दगी सब बेमतलब बिताए जा रहे हैं

हर छोटी बात में बहुत दिमाग़ लगाते हैं लोग
बस अंधविश्वास को यूँ ही निभाए जा रहे हैं

रोते हुए बच्चों में उन्हें भगवान नहीं दिखता
और वे पत्थर पर दूध-पानी चढ़ाए जा रहे हैं

किसी को किसी से बात करने का वक़्त नहीं  
पर whatsapp पर मैसेज लगातार आए जा रहे हैं

तू उनकी बदहवासी पर हँसता है 'गुलफ़ाम'
वे तुझे पागल जानकर मुस्काए जा रहे हैं

Friday, November 25, 2016

चौराहे पर


(c) Vijeta Dahiya

 तुम क्या करते हो
प्रश्न अनवरत बना रहा
शुरूआती वर्षों में तुमने कहा
कि अमुक स्कूल या कॉलेज में पढता हूँ
और फिर अगले वर्षों में बात रही
कि अमुक संस्थान में नौकरी करता हूँ
या खुद का कोई काम धंधा जमा लिया है
या किसी की पत्नी और बच्चे की माँ बनकर
मैंने घर संभाल लिया है
शायद बीच में कभी ऐसा भी हुआ है
कि तुम केवल तैयारी कर रहे थे
किसी कॉलेज में दाखिले
किसी नौकरी या शादी के लिए
नाउम्मीदी की सूरत में भी अकारण
तुम ओढ़े रहे आवरण
इस तैयारी का
और करते रहे पालन
औरों की या खुद की बनाई हुई
एक समय-सारणी का


पर क्या तुम रुके कभी किसी चौराहे पर
दोराहा एक अलग बात है
किस ओर का सवालिया निशान लिए हुए
जैसे आ जाए दोराहा नदी की मंझधार में
और किश्ती चलती रहे अनवरत
इस धार में या उस धार में
पर चौराहे पर मुमकिन होता है रुकना
कुछ ना करना
कुछ करने का नाटक भी ना करना
बस सोचना कि वाकई क्या करना है
या गलत राह पर भटक आए लोगों के लिए
दिशा बदलना या पीछे मुड़ना

चौराहे के पेड़ से गिरते हैं सेब
न्यूटन के सर पर
चौराहे पर भाषण देते हैं लेनिन
उमड़ती है जोश की लहर
चौराहे पर घूमते हैं स्टीव जॉब्स
कॉलेज बीच में छोड़कर
चौराहे से निकलते हैं सिद्धार्थ
बुद्ध होने की राह पर
चौराहे पर कबीर जैसे अनपढ़ जुलाहे
सत्संग करवाया करते हैं
चौराहे पर नफा नुक्सान छोड़कर दिमाग़
दिल की आवाज़ सुना करते हैं
चौराहे पर कविता सुनकर बहकने से
मज़लूम सर उठाया करते हैं
चौराहे पर ही क़ैस लैला के प्यार में
मजनूँ बन जाया करते हैं

चौराहे पर टूटते हैं तारे
चौराहे पर बनते हैं सितारे
चौराहे पर होती है हरेक क्रांति
कतारों में तो सिर्फ धक्के खाए जाते हैं
तुम धक्के खाते रहे हो
अपने पर्यावरण के थोपे हुए विचारों को
तुम अपनी पसंद बताते रहे हो
खुद को सडकों पर दौड़ाते रहे हो
और फिर हाँफते हुए
गले में कैमरा लटकाए हुए
तुम दो दिन चले गए पहाड़ों पर
दो घडी साँस लेने को
और वापस आकर फिर भागने लगे
रुके हुए रास्तों पर

हाँ, चौराहे पर रुकना
पहाड़ों पर रुकने जैसा सरल नहीं
चौराहे पर खड़े होने पर
तुम्हारी आज़ादी को लोग कहेंगे आवारगी
जाल बुनता जाएगा अस्थिरता का
हंसती निगाहें पूछेंगी क्या करते हो
बोध कराएँगी तुम्हें नग्नता का
चलते हुए दिमाग को अचानक रुकने पर
एहसास होगा एक रिक्तता का
क्योंकि सोचना-विचारना, ज़िन्दगी खंगालना
पर्याय है आजकल व्यर्थता का
लेकिन फिर भी
चौराहे पर कुछ वक़्त रुक जाना
क्योंकि अंतर्मन में हो या दुनिया में 
चौराहे पर ही होती है हरेक क्रांति


Friday, July 22, 2016

बस्तियों के राजकुमार? (The princes of slums)

काँच के शहरों में ऐसा होता है 
धूल में खेलते हुए गाँव में भी हुआ है  
हो सकता है ऐसा बाँसुरी बजाते हुए पहाड़ों में, 
और चाँदनी में नहाते हुए रेगिस्तान में भी 
जंगली वन में भले ही मुश्किल हो ऐसा होना
पर नामुमकिन बिल्कुल नहीं 
   
लेकिन बस्तियाँ जो खुद विशेषण हैं 
एक अलग तरह की उमस 
उस बस्तियों के जैसे अँधेरे का 
अनमनी शाम और सवेरे का 
उन बस्तियों में ना कभी यह हुआ 
और होने के आसार भी नहीं 

कैसे कहूँ 
कहूँ ऐसे कि बस्तियों में राजकुमार पैदा नहीं होते 
तो यह भगवान पर पक्षपात का आरोप होगा
और कहूँ कि बस्तियों में पैदा होने वाले 
कभी राजकुमार नहीं बन सकते 
तो हमारे संवैधानिक अवसर की समानता पर
एक सवालिया निशान होगा  

अगर सवाल के जवाब के लिए तहक़ीक़ात हुई  
तो सरकारी स्कूल का प्रिंसिपल और कोई मास्टर 
काजू बर्फी के शौक़ीन स्कूल इंस्पैक्टर और डायरेक्टर
मंत्री, एम एल ए, काउंसलर,   
कोई एन.जी.ओ. वाला, कोई ड्रग डीलर 
मुफ्त के छोले कुल्चे खाने वाला पुलिसिया 
तो कोई प्रॉपर्टी डीलर और बिल्डर  
मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, कारखाने वाला बाबू 
जिसे सस्ते मजदूर चाहिए   
और ना जाने कौन कौन पूछताछ के लिए बुलाए जाएँगे 
और दुविधा यह है कि फिर पूछताछ करेगा कौन

झमेला छोड़िए और बस यूँ कहिए 
इन बस्ती वालों ने तो बस 
बस्ती का माहौल ख़राब कर रखा है 
ये लोग ही जाने कैसे हैं जो 
राजकुमारों को पसंद नहीं करते