Thursday, June 15, 2017

बदहवासी (badhawasi) - ek ghazal




















तर्क से समझकर कोई किसी की नहीं मानता
सबने माना तो जरूर बेवकूफ़ बनाए जा रहे हैं

बनाएँगे घर चाँद पर, वहाँ मिल गया है पानी, 
यहाँ पड़ोस के घर में आग लगाए जा रहे हैं   

बिना मतलब के कुछ नहीं मतलबी दुनिया में
हाँ, ज़िन्दगी सब बेमतलब बिताए जा रहे हैं

हर छोटी बात में बहुत दिमाग़ लगाते हैं लोग
बस अंधविश्वास को यूँ ही निभाए जा रहे हैं

रोते हुए बच्चों में उन्हें भगवान नहीं दिखता
और वे पत्थर पर दूध-पानी चढ़ाए जा रहे हैं

किसी को किसी से बात करने का वक़्त नहीं  
पर whatsapp पर मैसेज लगातार आए जा रहे हैं

तू उनकी बदहवासी पर हँसता है 'गुलफ़ाम'
वे तुझे पागल जानकर मुस्काए जा रहे हैं

Friday, November 25, 2016

चौराहे पर


(c) Vijeta Dahiya

 तुम क्या करते हो
प्रश्न अनवरत बना रहा
शुरूआती वर्षों में तुमने कहा
कि अमुक स्कूल या कॉलेज में पढता हूँ
और फिर अगले वर्षों में बात रही
कि अमुक संस्थान में नौकरी करता हूँ
या खुद का कोई काम धंधा जमा लिया है
या किसी की पत्नी और बच्चे की माँ बनकर
मैंने घर संभाल लिया है
शायद बीच में कभी ऐसा भी हुआ है
कि तुम केवल तैयारी कर रहे थे
किसी कॉलेज में दाखिले
किसी नौकरी या शादी के लिए
नाउम्मीदी की सूरत में भी अकारण
तुम ओढ़े रहे आवरण
इस तैयारी का
और करते रहे पालन
औरों की या खुद की बनाई हुई
एक समय-सारणी का


पर क्या तुम रुके कभी किसी चौराहे पर
दोराहा एक अलग बात है
किस ओर का सवालिया निशान लिए हुए
जैसे आ जाए दोराहा नदी की मंझधार में
और किश्ती चलती रहे अनवरत
इस धार में या उस धार में
पर चौराहे पर मुमकिन होता है रुकना
कुछ ना करना
कुछ करने का नाटक भी ना करना
बस सोचना कि वाकई क्या करना है
या गलत राह पर भटक आए लोगों के लिए
दिशा बदलना या पीछे मुड़ना

चौराहे के पेड़ से गिरते हैं सेब
न्यूटन के सर पर
चौराहे पर भाषण देते हैं लेनिन
उमड़ती है जोश की लहर
चौराहे पर घूमते हैं स्टीव जॉब्स
कॉलेज बीच में छोड़कर
चौराहे से निकलते हैं सिद्धार्थ
बुद्ध होने की राह पर
चौराहे पर कबीर जैसे अनपढ़ जुलाहे
सत्संग करवाया करते हैं
चौराहे पर नफा नुक्सान छोड़कर दिमाग़
दिल की आवाज़ सुना करते हैं
चौराहे पर कविता सुनकर बहकने से
मज़लूम सर उठाया करते हैं
चौराहे पर ही क़ैस लैला के प्यार में
मजनूँ बन जाया करते हैं

चौराहे पर टूटते हैं तारे
चौराहे पर बनते हैं सितारे
चौराहे पर होती है हरेक क्रांति
कतारों में तो सिर्फ धक्के खाए जाते हैं
तुम धक्के खाते रहे हो
अपने पर्यावरण के थोपे हुए विचारों को
तुम अपनी पसंद बताते रहे हो
खुद को सडकों पर दौड़ाते रहे हो
और फिर हाँफते हुए
गले में कैमरा लटकाए हुए
तुम दो दिन चले गए पहाड़ों पर
दो घडी साँस लेने को
और वापस आकर फिर भागने लगे
रुके हुए रास्तों पर

हाँ, चौराहे पर रुकना
पहाड़ों पर रुकने जैसा सरल नहीं
चौराहे पर खड़े होने पर
तुम्हारी आज़ादी को लोग कहेंगे आवारगी
जाल बुनता जाएगा अस्थिरता का
हंसती निगाहें पूछेंगी क्या करते हो
बोध कराएँगी तुम्हें नग्नता का
चलते हुए दिमाग को अचानक रुकने पर
एहसास होगा एक रिक्तता का
क्योंकि सोचना-विचारना, ज़िन्दगी खंगालना
पर्याय है आजकल व्यर्थता का
लेकिन फिर भी
चौराहे पर कुछ वक़्त रुक जाना
क्योंकि अंतर्मन में हो या दुनिया में 
चौराहे पर ही होती है हरेक क्रांति


Friday, July 22, 2016

बस्तियों के राजकुमार? (The princes of slums)

काँच के शहरों में ऐसा होता है 
धूल में खेलते हुए गाँव में भी हुआ है  
हो सकता है ऐसा बाँसुरी बजाते हुए पहाड़ों में, 
और चाँदनी में नहाते हुए रेगिस्तान में भी 
जंगली वन में भले ही मुश्किल हो ऐसा होना
पर नामुमकिन बिल्कुल नहीं 
   
लेकिन बस्तियाँ जो खुद विशेषण हैं 
एक अलग तरह की उमस 
उस बस्तियों के जैसे अँधेरे का 
अनमनी शाम और सवेरे का 
उन बस्तियों में ना कभी यह हुआ 
और होने के आसार भी नहीं 

कैसे कहूँ 
कहूँ ऐसे कि बस्तियों में राजकुमार पैदा नहीं होते 
तो यह भगवान पर पक्षपात का आरोप होगा
और कहूँ कि बस्तियों में पैदा होने वाले 
कभी राजकुमार नहीं बन सकते 
तो हमारे संवैधानिक अवसर की समानता पर
एक सवालिया निशान होगा  

अगर सवाल के जवाब के लिए तहक़ीक़ात हुई  
तो सरकारी स्कूल का प्रिंसिपल और कोई मास्टर 
काजू बर्फी के शौक़ीन स्कूल इंस्पैक्टर और डायरेक्टर
मंत्री, एम एल ए, काउंसलर,   
कोई एन.जी.ओ. वाला, कोई ड्रग डीलर 
मुफ्त के छोले कुल्चे खाने वाला पुलिसिया 
तो कोई प्रॉपर्टी डीलर और बिल्डर  
मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, कारखाने वाला बाबू 
जिसे सस्ते मजदूर चाहिए   
और ना जाने कौन कौन पूछताछ के लिए बुलाए जाएँगे 
और दुविधा यह है कि फिर पूछताछ करेगा कौन

झमेला छोड़िए और बस यूँ कहिए 
इन बस्ती वालों ने तो बस 
बस्ती का माहौल ख़राब कर रखा है 
ये लोग ही जाने कैसे हैं जो 
राजकुमारों को पसंद नहीं करते 

Wednesday, May 18, 2016

Mard ka dard (मर्द का दर्द)

वह इंसानों के घर में ही पैदा हुआ था
जन्म के समय उसे कोई बीमारी नहीं थी
हाथ-पैर, नाक, कान, आँख, मुँह सब सही थे
हाँ, दिल और दिमाग भी
उसे बड़े हो कर एक आदमी बन जाना था
लेकिन समाज ने उसे कहीं का ना छोड़ा
और अंत में वह
एक मर्द बनकर रह गया

बचपन में
उसके गाल बहुत मुलायम थे
जो स्कूल से आते हुए
जेठ की दुपहरी में लाल हो जाते थे
माँ ठंडे पानी से उसका मुँह धो कर 
अपने आँचल से पोंछती बड़े प्यार से 
शाम को मोहल्ले के सभी बच्चे
जिनके लड़का-लड़की में श्रेणित होने में
अभी एक-दो साल बाकी थे
सब इकट्ठे हो कर पैंडलूस खेलते,
कभी धूल में लेटते 
कभी किसी को पीटते और कभी खुद पिट जाते
वह बारिश में नंग-धडंग नहाता था
वह नाली के पानी में कागज़ की किश्ती चलाता था
और सुनने में तो यह भी आया है कि
पिताजी जब तक उसके लिए बन्दूक नहीं लाए थे
वह एक-दो बार गुड़ियों से भी खेला था 
वह अपने नन्हे हाथों से घर में झाड़ू लगाता
कभी चूल्हे के पास बैठकर माँ के साथ
अपनी छोटी सी रोटी बनाता  
माँ का लाडला, जो जल्दी ही
किसी भी बात पर रूठ जाता था

फिर एक दिन
अपनी नाक के नीचे हो रहे इस तमाशे की
उसके पिताजी को भनक लग गई
उन्होंने उसे इतना ज़ोर से डाँटा
कि उसके दिल की एक आर्टरी बंद हो गई
रक्त का संचार कुछ तेज़ गति से होने लगा 
एहसास का दिल में जाना रुक गया

फिर उसे रामायण का पाठ पढ़ाया गया
एक पर-स्त्री के स्पर्श मात्र से होने वाले
अनर्थ के बारे में बताया गया
फिर वह लड़कों से तो
अजनबी होने पर भी गले मिल लेता
पर किसी जान-पहचान की लड़की से भी
कभी हाथ ना मिला पाया 
उसे सब लड़कियों से बात करने में
शर्म महसूस होने लगी

उसने माँ को सब बातें बताना छोड़ दिया
अपनी बहन के साथ भी उसका
सब हंसी-मज़ाक सहम गया
लड़ाईयाँ शांत हो गई
वह बहन का रक्षक बन गया

वह छूआ-छूत का खेल सरकारी स्कूल में भी था
जहाँ क्लास में लड़कियों को
अलग लाइन में बिठाया जाता था
और बाहर मैदान में एक पी.टी.आई.
इस तरह नज़र रखता था
जैसे एक गड़रिया
अपनी भेड़ों को भेड़िये से बचाता है
लेकिन तब तक भी उसकी
थोड़ी सी मासूमियत का क़त्ल होना बाकी था

फिर कुछ ऐसा था
जिसका नाम उसने इधर-उधर सुना था
जिसका मतलब उसे ना बता कर
जिसके बारे में हर जानकारी उस से छुपा कर
उसके मन में जरुरत से ज़्यादा
उत्साह उत्पन्न कर दिया गया था
जिसका ज़िक्र सब लड़कों में हंसी के साथ
कानाफूसी और इशारों में होता था
जो कभी एक एडवेंचर तो कभी
उसका एक अपराध बोध बन गया था 
और इस तरह धीरे धीरे
वह मर्द बन रहा था
उसकी गुणवत्ता का पैमाना
ईमानदारी, सच्चाई या खुशमिजाज़ी ना हो कर
अब उसकी मर्दानगी था
और मर्दानगी का पैमाना बहुत गड़बड़ था

वह बात बात पर
माँ-बहन की गालियाँ देने लगा 
हवा के झोंकों के साथ बात करने की बजाए
किसी जंगली सूअर की तरह आँखें निकाल कर 
अपनी और दूसरों की जान दाँव पर लगा कर
बहुत तेज़ स्पीड पर कार चलाने लगा  
शराब पीते हुए उसे हर वक़्त बस
और ज़्यादा पीने की ललक लगी रही
उसने एक घूँट में पैग पिए
उसने बिना पानी के पी, उसने उल्टियाँ की
वह नशे में बदहवास हुआ, फिर गिर कर सो गया 
उसने कम वक़्त में ज़्यादा पीने के बहुत रिकॉर्ड बनाए
बस शराब के खुमार का कभी
इत्मीनान से आनंद नहीं लिया
वह कभी ना जान पाया वह मासूम एहसास
किसी अजनबी से नज़र मिल जाना
और एक मुस्कराहट का इधर से उधर तैर जाना
क्यूंकि लड़कों की तरफ मुस्कुराने में
उसे समलैंगिक समझे जाने का डर लगा रहा
और लड़कियों से नज़र मिलाने की बजाए
वह उन्हें कनखियों से घूरता रहा
वह एक नायक बन सकता था
किसी लड़की को तंग किये जाने पर एतराज़ जताकर
लेकिन वह मर्द एक कायर बना रहा 
वह किसी मजदूरी की भट्टी में जलते हुए बच्चे का
फरिश्ता बन सकता था
लेकिन उस भट्टी की आग से उसका पत्थर दिल नहीं पिघला
वह किसी लड़की के दिल का
अरमान हो सकता था
लेकिन वह आशिक़ और लफंगा होने में
कभी फ़र्क़ नहीं समझ पाया
वह देशभक्ति का जज़्बा लिए हुए
एक राष्ट्रनिर्माता हो सकता था लेकिन
उसे दिखाई दिए केवल
भगत सिंह की मूँछ का ताव और उसकी बन्दूक
वह कभी नहीं देख पाया उसके ज्वलंत विचार
उसकी नि:स्वार्थ भावना और इंसानियत को   
वह बन सकता था एक चित्रकार या डांसर 
लेकिन वह डोले बनाना ही अपना हठधर्म समझता रहा 
वह अपनी बहन की विदाई पर रो नहीं पाया  
वह एक आखिरी बार भी उसे गले ना लगा सका 
बस खड़ा रहा दूर किसी कोने में
जज़्बातों के तूफ़ान को होंठों तले दबोचे हुए

उसने कभी मोहब्बत की तपिश महसूस नहीं की 
पर हाँ, उसकी एक गर्लफ्रेंड बन गई
पहली बार किसी हमसफ़र का हाथ पकड़ने पर
उसके दिल में गुदगुदी नहीं हुई  
उसे उसकी बाँहों में जहान नहीं मिला
शर्म से सुर्ख हुए गालों में
कभी सुबह का आसमान नहीं मिला
क्योंकि वह हर वक़्त
सिर्फ और सिर्फ सैक्स के लिए मचलता रहा
और उसे उसमें भी जन्नत नसीब नहीं हुई
उसके ओछेपन को बस एक बात मिल गई
दोस्तों के आगे डींगें हाँकने के लिए
फिर वह धोखा करता हुआ लड़कियों के दिल तोड़ता रहा
और गिनती करता रहा अपने सैक्स एपिसोड्स की
लेकिन उसका मन यूँ ही शुष्क रहा
उसने मोहब्बत में लुट जाने का मज़ा ना जाना
उसने किसी को खाते हुए, मुस्कुराते हुए,
गाते हुए, उसके पास आते हुए,
सोते हुए, कुछ कुछ बताते हुए देखने 
और देखते रहने का सुकून कभी ना पाया

उसकी शादी की सुहाग रात पर
उसकी पत्नी रातरानी के फूल जैसी
सकुचाई हुई बैठी थी
एक मादकता का फुव्वारा अपने नाखूनों में छिपाए हुए
आसमान में देवता अपने हाथों की अंजुलि में
फूल लिए खड़े थे
नैसर्गिक सौंदर्य से भरी हुई एक रासलीला
उसके बिस्तर के सिराहने खड़ी थी
चादर की गुलझटों में लुका-छिपी करने के लिए
लेकिन मर्दानगी वहाँ भी आ धमकी
रोमांस के पर्दों में आग लगाने के लिए
उसका मन खुद को साबित करने में ही जकड़ा रहा
उसका तन लकड़ी की तरह अकड़ा रहा 
उसने खुद को फिर एक बार मर्द साबित कर लिया 
और बस इतनी ही देर में रात बुझ गई
कमरे की बत्ती जल गई
और एक प्यासी नदी धूल में मिल गई
जो अधिकतर प्यासी ही रही

फिर जब उसे एक बच्चा हुआ
तो दुनिया को भी अपनी मर्दानगी का सबूत दे कर
वह बहुत खुश हुआ
फिर चारों तरफ देखा तो दिखा
कि कुछ कमनसीब लोगों के सिवा
सभी के पास अपने अपने बच्चे थे
फिर कौनसी इस में बड़ी बात थी
जिसे साबित करने के लिए वह ज़िन्दगी भर
एक आदमी बनने से कतराता रहा

तब भी उसकी बेटी उसके निर्जन को हरा कर देती
उसके गालों को चूम कर
उसकी गोदी में झूम कर
उसका बेटा अपनी मीठी मीठी बातों से
अपने स्कूल के हँसी-मज़ाक के किस्से सुनाकर
उसका उपचार कर सकता था
लेकिन वह उनका भविष्य बनाने वाला
डाँट-डपट कर उन्हें बिगड़ने से बचाने वाला
कभी प्यार ना दिखाने वाला
एक अक्खड़ बाप बना रहा
नौकरी में उसका बॉस
और चौराहे पर खड़ा पुलिसिया 
जब तब उसकी मर्दानगी पर चोट करता रहा
जिसका गुस्सा वह बच्चों की पढाई पर
या कभी पत्नी के खाने पर निकालता रहा
फिर पत्नी के साथ धीरे धीरे
उसका सम्बन्ध बस नाम का रह गया

उसकी मर्दानगी के शिथिल होने पर
डींगे हाँकने वाली जवानी खोने पर
उसके पास करने को कुछ भी ना रहा
वह नए ज़माने को गाली देता हुआ
मौत का इंतज़ार करता है

Sunday, May 15, 2016

धुंध

बूझो तो जानें
या सिर्फ मिथ्या मानें
उस चीज़ को
जो है फूल की गंध जैसी
पानी में उठती तरंग जैसी
क्या है वह
जो किसी पुराने दोस्त की तरह
पीछे से दबे पाँव आती है
और ढक लेती है तुम्हारी आँखें
अपनी हथेलियों से
जिसे तुम छू नहीं पाते
और वह तुम्हें छू कर चली जाती है
एकाएक
कभी दफ्तर में अकेले होने पर
किसे ढूँढती हैं तुम्हारी आँखें खिड़की के बाहर
क्यों स्तब्ध हो जाते हो तुम
किसी झील के किनारे खड़े हुए
हवा के एक झोंके से
तुम्हारी आँख में पानी भर आता है
दिल में एक हूक सी उठती है
तुम मुस्कुराने लगते हो
गलती से

क्या होता है तुम्हारे साथ ऐसा
या ऐसा होना बंद हो गया है

कि औरों के साथ तुम्हारा मुँह
बोलने से बंद नहीं होता
और अकेले कहीं भी जाने या कुछ भी करने में
तुम्हें डर लगता है
और अकेले कहीं जाना भी पड़ जाए
बस में, मेट्रो में  
तो अपने दिमाग़ को खूब उलझाए रखते हो तुम
मोबाइल के किसी गेम में या अखबार में
चुगलियों में, रोज़ की उलझनों में
फायदे-नुक्सान में
आगे के किसी प्लान में  

फिर भी कभी कभी चोरी-छिपे
भीड़ के बीच में से
वह आ पहुँचे तुम तक पीछे से
और ढक ले तुम्हारी आँखें
अपनी हथेलियों से
तो खुद को झटकते हो तुम
कहते हो कि कुछ भी तो नहीं
कि तुम्हें याद तो है ही नहीं कि क्या है
तुम साथ ही भूल भी गए हो कहीं
कि कुछ था
जो दिखता नहीं था,
जिसे छू नहीं सकते थे,
एक आवाज़ जो सुनाई नहीं देती थी
पर तुम्हें कहीं बुलाती थी
जाओगे वहाँ
ढूँढ पाओगे उसे
या हर बात को अब कहोगे
मिथ्या और बकवास 

Friday, March 25, 2016

स्टारडस्ट (Stardust) - a poem for Rohith Vemula



रोहिथ, तुम्हें
बचपन में कभी प्यार नहीं मिला
तुम्हारा जन्म एक भयंकर दुर्घटना थी
तुम गर्भ से लिखवा कर आए थे
नीची नज़रों से देखा जाना
तुम्हें विरासत में मिला हुआ था
दुनिया की दुत्कार खाना
तुमने जब कभी खुद को
एक इंसान के रूप में देखने की कोशिश की
तुम्हें आईना दिखाया गया
तुम्हारी पहचान से अवगत कराया गया
कि तुम सबसे पहले एक दलित हो
और उसके बाद
तुम्हें कुछ होने नहीं दिया जाएगा
तुम दलितों पर होने वाले शोषण सहोगे
दलितों के हक की बात कहोगे
अम्बेडकर  तुम्हारे लिए आदर्श होंगे
तुम दलितों के लिए निर्धारित काम करोगे
अगर इतना पढ़-लिख सके
कि किसी नौकरी का सोच सको
तो नौकरी में आरक्षण पाओगे
खैर, जो भी नौकरी पाओ
अगर नेता भी बन जाओ
तो भी दलित नेता ही कहलाओगे
उसी दृष्टि से देखे जाओगे

लेकिन तुम्हारा हरेक बात पर चकित होना 
जीवन को बहते देखना अविरल
मन में निरंतर उठते सवाल 
प्रकृति पर नित नया कौतूहल
जिसे अक्सर स्कूल में मार दिया जाता है
किसी तरह बच निकला
तुमने हीन भावना के नागपाश को तोड़ दिया
शोषक दुनिया के लिए नफरत
तुम्हें नहीं जकड़ पायी
जाने कैसे हुआ यह चमत्कार
जो उस दुर्घटना से टकरा गया
कि तुम नीचे तबके के
तुम नीची जाति के 
इतने ऊँचे आसमान को देखने लगे
जाने कहाँ से तुमने कार्ल सागन का नाम सुना
कैसे तुम उसके रस्ते पर चलने लगे
मैं नहीं जानता कि कार्ल सागन कौन था
पर जिसकी तरह तुम बनना चाहते थे
वह तुम्हारे जैसा ही कोई होगा
आसमान में झाँकने वाला
चाँद को निहारने वाला
तारे गिनने वाला
विज्ञान पर लिखने वाला
कोई दीवाना खगोलशास्त्री

तुम उसकी तरह लिखना चाहते थे
पर इस बार दुर्घटना चमत्कार से टकरा गई
और अंत में तुम
बस एक सुसाईड नोट लिख पाए
तुम्हारा एक दुर्लभ उत्सुक, सुन्दर मन था
जिस में एक निराला स्वप्न था
तुम स्टारडस्ट से बने थे
तुम्हारे दिमाग में बहुत से अनोखे ख्याल थे
मानवता और विज्ञान के
पर मुझे अफ़सोस है
कि तुम्हारी क्षमता से दुनिया वंचित रह गई
अब कुछ लोग तुम्हारे लिए न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं 
वे हार मानने को तैयार नहीं
मुझे उनकी लड़ाई से बहुत हमदर्दी है
कुछ दूसरे लोग तुम्हें कायर और पलायनवादी कहते हैं
कहते हैं कि तुम हार गए
मुझे उनसे और भी ज़्यादा हमदर्दी होती है
वे जीवन की प्रत्येक कोमलता से वंचित हो चुके हैं
तुम हार-जीत से परे जहाँ चले गए हो
वहाँ उनकी कठोरता नहीं पहुँच सकती
लेकिन उन्हें अपनी इस कठोरता के साथ
अपना पूरा जीवन गुज़ारना है
यूनिवर्सिटी, पुलिस, कचहरी, राजनीति  
अब तुम किसी के लिए जवाबदेह नहीं हो
तुम अनंत में शामिल हो गए हो
हैदराबाद के एक घर की छत पर खड़ा हुआ
एक बच्चा एक तारे को ढूँढ रहा है 
ओरियन का एक तारा जो ओझल हो गया है
क्योंकि हैदराबाद के आकाश में आज बहुत धुआँ है
कुछ देर वहाँ चमकना रोहिथ
उस तारे के मिल जाने पर फिर निकल जाना
नई उल्काओं, ग्रहों, सितारों
और नए संसारों की खोज में.....